भारत के FCRA कानून में प्रस्तावित बदलाव पर अमेरिका ने जताई चिंता, अमेरिकी सांसद राइली मूर ने उठाए सवाल
भारत के FCRA संशोधन प्रस्ताव पर अमेरिका के सांसद राइली मूर ने चिंता जताई है। जानिए FCRA क्या है, प्रस्तावित बदलाव क्या हैं, भारत सरकार का पक्ष और इस विवाद का पूरा विश्लेषण।
नई दिल्ली/वॉशिंगटन: भारत सरकार द्वारा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act - FCRA) में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। अमेरिका के रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने इन प्रस्तावित बदलावों पर चिंता व्यक्त करते हुए दावा किया कि इससे भारत में चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर असर पड़ सकता है। वहीं भारत सरकार का कहना है कि इन संशोधनों का उद्देश्य केवल विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर निगरानी सुनिश्चित करना है।
क्या है FCRA?
Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) भारत का एक कानून है, जिसके तहत किसी भी गैर-सरकारी संगठन (NGO), ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थान या धार्मिक संस्था को विदेश से मिलने वाले दान (Foreign Contribution) को नियंत्रित किया जाता है।
इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध न हो तथा विदेशी फंड का उपयोग पूरी पारदर्शिता के साथ किया जाए।
प्रस्तावित संशोधन क्या हैं?
संसद के विचाराधीन FCRA संशोधन विधेयक 2026 में कई महत्वपूर्ण बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं।
मुख्य प्रस्तावों में शामिल हैं:
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FCRA पंजीकरण समाप्त, रद्द या नवीनीकरण न होने की स्थिति में विदेशी धन से बनी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए Designated Authority की व्यवस्था।
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विदेशी योगदान और उससे निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन की स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया।
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परियोजना आधारित और अधिक विस्तृत रिपोर्टिंग व्यवस्था।
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विदेशी फंड के उपयोग में अधिक पारदर्शिता और निगरानी।
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उल्लंघनों पर दंड व्यवस्था में कुछ बदलाव तथा अपील की व्यवस्था।
अमेरिकी सांसद ने क्या कहा?
अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद राइली मूर ने सोशल मीडिया मंच X पर कहा कि प्रस्तावित संशोधन भारत सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर अधिक नियंत्रण का अधिकार दे सकते हैं। उन्होंने इसे ईसाई समुदाय के लिए चिंता का विषय बताया और कहा कि यह मुद्दा भारत-अमेरिका संबंधों को भी प्रभावित कर सकता है।
भारत सरकार का पक्ष
भारत सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि FCRA किसी एक धर्म, समुदाय या संस्था को निशाना बनाने वाला कानून नहीं है।
सरकार के अनुसार:
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यह कानून सभी FCRA पंजीकृत संस्थाओं पर समान रूप से लागू होता है।
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संशोधनों का उद्देश्य केवल प्रशासनिक सुधार और जवाबदेही बढ़ाना है।
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विदेशी फंड से बनी संपत्तियों के संबंध में व्यवस्था पहले भी कानून में मौजूद थी, नए संशोधन केवल उसकी प्रक्रिया को स्पष्ट करते हैं।
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पूजा स्थलों के धार्मिक स्वरूप को बनाए रखने का भी प्रावधान प्रस्तावित है।
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भारत सहित अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अन्य कई देशों में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने वाले समान कानून मौजूद हैं।
विपक्ष और अन्य संगठनों की चिंताएं
कुछ राजनीतिक दलों, चर्च संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने आशंका जताई है कि नए प्रावधानों से छोटे NGO, धार्मिक संस्थाएं और चैरिटी संगठनों पर अनुपालन (Compliance) का बोझ बढ़ सकता है।
मिजोरम सहित कुछ राज्यों में चर्च संगठनों ने प्रस्तावित संशोधनों के विरोध में प्रदर्शन की घोषणा भी की है।
भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी देश को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेशी फंडिंग पर कानून बनाने का अधिकार है। हालांकि यदि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़ते हैं तो यह कूटनीतिक चर्चा का विषय बन सकता है। फिलहाल यह विधेयक संसद के विचाराधीन है और अंतिम निर्णय संसद द्वारा ही लिया जाएगा।
निष्कर्ष
FCRA संशोधन को लेकर भारत और अमेरिका के बीच अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। जहां अमेरिकी सांसद राइली मूर ने धार्मिक स्वतंत्रता और चर्चों को लेकर चिंता जताई है, वहीं भारत सरकार का कहना है कि यह संशोधन केवल विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए हैं तथा किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना नहीं बनाते।
अंतिम रूप से यह विधेयक संसद की प्रक्रिया और उसके बाद लागू होने वाले नियमों पर निर्भर करेगा। तब तक इस विषय पर होने वाली आधिकारिक घोषणाओं और संसदीय कार्यवाही पर नजर रखना महत्वपूर्ण होगा।
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