‘वंदे मातरम’ पर कांग्रेस का दो टूक रुख, 1937 में तय दो पदों की परंपरा रहेगी जारी
एक तरफ राष्ट्रीय प्रतीक से जुड़ा इतिहास फिर चर्चा में है, तो दूसरी ओर जनसंख्या के आधार पर राजनीतिक प्रतिनिधित्व बदलने की तैयारी ने राज्यों के बीच संतुलन का सवाल खड़ा कर दिया है।
वंदे मातरम’ को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच जारी राजनीतिक विवाद ने एक बार फिर स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास, राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और देश की बहुलतावादी पहचान से जुड़े प्रश्नों को सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। कांग्रेस ने हालिया आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि पार्टी अपने कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के केवल शुरुआती दो पदों के गायन की अपनी 1937 में स्थापित परंपरा को जारी रखेगी। पार्टी का तर्क है कि यह निर्णय किसी मौजूदा राजनीतिक परिस्थिति का परिणाम नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विभिन्न समुदायों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिया गया ऐतिहासिक निर्णय था।
विवाद को उस समय और बल मिला जब स्वतंत्रता दिवस पर कांग्रेस मुख्यालय में ‘वंदे मातरम’ का पूर्ण गायन हुआ और सामने आए एक वीडियो को लेकर भाजपा ने सोनिया गांधी तथा कांग्रेस नेतृत्व पर राष्ट्रगीत के गायन को रोकने का आरोप लगाया। कांग्रेस ने इस आरोप को असत्य बताते हुए कहा कि सोनिया गांधी का संकेत गीत को रोकने के लिए नहीं, बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था से संबंधित था।
इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में लोकसभा परिसीमन का मुद्दा भी बहस का दूसरा बड़ा केंद्र बन गया है। केंद्र सरकार 50 प्रतिशत वृद्धि के मॉडल के तहत लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाने की दिशा में प्रस्ताव लेकर आई है, जबकि कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों, के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर संभावित प्रभाव को लेकर आपत्ति जताई है। कांग्रेस की ओर से मौजूदा 543 सीटों को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की मांग भी सामने आई है।
इन दोनों मुद्दों के केंद्र में एक समान प्रश्न दिखाई देता है—क्या राष्ट्रीय एकता का आधार केवल समान प्रतीकों और जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व होना चाहिए, या फिर भारत की विविध सामाजिक, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय परिस्थितियों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए?
1937 में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो पदों को लेकर क्या और क्यों तय किया गया था?
‘वंदे मातरम’ मूल रूप से बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना थी और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना का एक प्रभावशाली प्रतीक बन गया था। हालांकि, गीत के पूरे पाठ को लेकर समय के साथ धार्मिक और सांस्कृतिक आपत्तियां भी सामने आईं।
1937 में कांग्रेस के भीतर इस विषय पर गंभीर विमर्श हुआ। सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर के बीच इस विषय को लेकर संवाद हुआ और टैगोर की राय भी महत्वपूर्ण मानी गई। टैगोर का मत था कि मूल रचना के साहित्यिक संदर्भ और बाद के पदों में मौजूद धार्मिक प्रतीकों को देखते हुए पूरे गीत को बहुधार्मिक राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करना सभी समुदायों के लिए समान रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकता। उन्होंने शुरुआती दो पदों को मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और उसके प्रति भावनात्मक लगाव की ऐसी अभिव्यक्ति माना, जिसमें धार्मिक आपत्ति की गुंजाइश अपेक्षाकृत कम थी।
इसके बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में यह निर्णय लिया कि राष्ट्रीय सभाओं में ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो पद गाए जाएं। उस समय उद्देश्य गीत की राष्ट्रीय भूमिका को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसकी ऐसी प्रस्तुति सुनिश्चित करना था जिसे विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोग सहजता से स्वीकार कर सकें।
इस निर्णय की पृष्ठभूमि में गीत के बाद के पदों में देवी-देवताओं से जुड़े संदर्भ भी महत्वपूर्ण थे। जबकि शुरुआती दो पद मुख्यतः मातृभूमि की प्राकृतिक संपन्नता और सौंदर्य का चित्रण करते हैं, बाद के पदों में देवी दुर्गा आदि के धार्मिक बिंब आते हैं। ऐसे में स्वतंत्रता आंदोलन के उस दौर में, जब ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक राष्ट्रीय एकजुटता की आवश्यकता थी, नेतृत्व ने एक ऐसे स्वरूप को प्राथमिकता दी जो अधिक समावेशी हो।
इसलिए 1937 का निर्णय केवल गीत को छोटा करने का फैसला नहीं था, बल्कि उस समय के राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में राष्ट्रीय एकता तथा धार्मिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास था।
‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो पदों का अर्थ क्या है?
‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो पदों में भारतभूमि को एक ममतामयी माता के रूप में संबोधित किया गया है। इसमें मातृभूमि की प्राकृतिक संपन्नता, हरियाली, जल, फलों की प्रचुरता, शीतल हवाओं और चांदनी रातों का अत्यंत काव्यात्मक चित्रण मिलता है।
पहले पद में भारत की धरती को जल और फलों से समृद्ध, शीतल हवाओं से परिपूर्ण तथा फसलों की हरियाली से सजी हुई बताया गया है। यहां मातृभूमि की छवि किसी विशेष धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रकृति और भूमि के माध्यम से पूरे देश के साथ भावनात्मक संबंध स्थापित करती है।
दूसरे पद में इसी मातृभूमि की सुंदरता को और विस्तार मिलता है। चांदनी से प्रकाशित रातें, फूलों से सजे वृक्ष, मधुर भाषा और सुख प्रदान करने वाली माता—ये सभी बिंब भारतभूमि को एक ऐसी जीवनदायिनी शक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसके प्रति कृतज्ञता और सम्मान की भावना स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है।
यही वह विशेषता थी जिसके कारण शुरुआती दो पदों को अपेक्षाकृत अधिक समावेशी माना गया। बाद के पदों में धार्मिक प्रतीकों की उपस्थिति के विपरीत, पहले दो पदों का केंद्र मातृभूमि की प्रकृति, समृद्धि और उसके प्रति नागरिक का भावनात्मक जुड़ाव है।
15 अगस्त को कांग्रेस पर ‘वंदे मातरम’ के अपमान का आरोप आखिर क्यों लगा?
स्वतंत्रता दिवस 2026 के अवसर पर कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम’ का पूर्ण गायन किया गया। इसी दौरान सामने आए एक वीडियो में कांग्रेस की संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी के कुछ संकेत दिखाई दिए, जिसके बाद भाजपा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व ने राष्ट्रगीत के पूर्ण गायन को रोकने का प्रयास किया। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया और भाजपा ने इसे राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति अनादर के रूप में प्रस्तुत किया।
हालांकि, कांग्रेस ने इस आरोप को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया। पार्टी की ओर से कहा गया कि सोनिया गांधी का संकेत ‘वंदे मातरम’ को रोकने के लिए नहीं था, बल्कि मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था से संबंधित था। कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि उस कार्यक्रम में राष्ट्रगीत का पूर्ण गायन वास्तव में हुआ था।
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके समानांतर कांग्रेस ने अपनी कार्यसमिति के स्तर पर यह दोहराया है कि पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों में वह 1937 में निर्धारित शुरुआती दो पदों की परंपरा का पालन करेगी। दूसरी ओर, भाजपा का तर्क है कि राष्ट्रगीत के पूर्ण स्वरूप को लेकर किसी प्रकार की आपत्ति राष्ट्रीय भावना के प्रतिकूल है। कांग्रेस इसे ऐतिहासिक निर्णय और बहुलतावादी दृष्टिकोण से जोड़ रही है।
इस पूरे प्रकरण में एक तथ्यात्मक अंतर समझना आवश्यक है—15 अगस्त की विवादित घटना के संबंध में सामने आया वीडियो कांग्रेस मुख्यालय, नई दिल्ली का था, केरल के किसी समारोह का नहीं। केरल में ‘वंदे मातरम’ के पूर्ण गायन को लेकर अलग राजनीतिक विवाद जरूर सामने आया था, जहां केंद्र के निर्देशों के बाद राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठे थे।
इस प्रकार एक ही राष्ट्रीय गीत को लेकर दो अलग-अलग घटनाक्रमों ने राजनीतिक बहस को और व्यापक बना दिया।
भाजपा सरकार परिसीमन क्यों चाहती है?
परिसीमन का सामान्य अर्थ है—जनसंख्या और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं तथा उनके प्रतिनिधित्व का पुनर्निर्धारण। भारत में लोकसभा सीटों का वर्तमान अंतर-राज्यीय वितरण 1971 की जनगणना पर आधारित है। 1976 में इसे स्थगित किया गया था और बाद में 2002 में इस रोक को 2026 तक बढ़ाया गया।
केंद्र सरकार के परिसीमन प्रस्ताव के पीछे कई प्रमुख तर्क हैं।
पहला—महिला आरक्षण को लागू करना।
2023 में पारित 106वें संविधान संशोधन के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था। इसके क्रियान्वयन को जनगणना और उसके बाद परिसीमन से जोड़ा गया है। सरकार का तर्क है कि परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर महिला आरक्षण को जल्द लागू करने का रास्ता तैयार किया जा सकता है।
दूसरा—जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व।
वर्तमान 543 लोकसभा सीटों का अंतर-राज्यीय वितरण 1971 की लगभग 55 करोड़ आबादी के आधार पर बना था। आज देश की आबादी इससे कहीं अधिक है। इसलिए सरकार का तर्क है कि बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि से नागरिकों का प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित हो सकता है।
तीसरा—नई संसद की क्षमता का उपयोग।
नई संसद भवन को अधिक संख्या में सांसदों को समायोजित करने की क्षमता को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। सरकार इसे भविष्य के विस्तारित प्रतिनिधित्व के लिए उपलब्ध संस्थागत क्षमता के रूप में देखती है।
चौथा—2026 में मौजूदा संवैधानिक रोक का समाप्त होना।
1976 में लागू की गई सीट-वितरण संबंधी रोक को 2002 में 2026 तक बढ़ाया गया था। इसलिए 2026 के बाद परिसीमन का प्रश्न संवैधानिक रूप से फिर प्रमुख हो गया है।
केंद्र सरकार के प्रस्ताव में लोकसभा की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि का मॉडल सामने आया है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 850 और 816 के बीच अंतर है। सरकारी प्रस्तुति में 850 को ऊपरी सीमा के rounded-off figure के रूप में बताया गया है, जबकि 50 प्रतिशत वृद्धि के मॉडल में वास्तविक संख्या 816 बताई गई है।
सरकार का यह भी कहना है कि दक्षिण भारतीय राज्यों को नुकसान नहीं होगा। गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि मौजूदा 129 दक्षिणी सांसदों की संख्या प्रस्तावित मॉडल में बढ़कर 195 हो सकती है और कुल लोकसभा में उनका हिस्सा लगभग 24 प्रतिशत के आसपास बना रहेगा।
परिसीमन पर कांग्रेस की आपत्ति क्या है और वह 543 सीटों को बनाए रखने की बात क्यों कर रही है?
परिसीमन को लेकर कांग्रेस और कई अन्य विपक्षी दलों की मुख्य चिंता प्रतिनिधित्व के क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ी है। दक्षिणी राज्यों का तर्क है कि उन्होंने दशकों तक जनसंख्या नियंत्रण, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को प्रतिनिधित्व का प्रमुख आधार बनाया जाता है, तो अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की लोकसभा में सीटें तेजी से बढ़ सकती हैं और अपेक्षाकृत कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों का राजनीतिक वजन घट सकता है।
इसी आशंका के कारण कांग्रेस और दक्षिणी राज्यों के कई राजनीतिक समूहों ने मौजूदा 543 सीटों को एक निश्चित अवधि तक बनाए रखने की मांग की है। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने भी लोकसभा की वर्तमान संख्या को बनाए रखने के पक्ष में तर्क दिया है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को इसके लिए राजनीतिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
यह विवाद केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि उस मूल प्रश्न का है कि भारतीय संघीय व्यवस्था में ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत और राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन के बीच किस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया जाए।
केंद्र सरकार जहां बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व को लोकतांत्रिक आवश्यकता मानती है, वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि केवल जनसंख्या के आधार पर पुनर्वितरण से उन राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से अपनाया।
इसलिए 543 सीटों को अगले 25 वर्षों तक बनाए रखने की मांग को केवल परिसीमन का विरोध मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे संघीय संतुलन, जनसंख्या नीति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े व्यापक प्रश्न मौजूद हैं।
निष्कर्ष
‘वंदे मातरम’ और परिसीमन—दोनों मुद्दे पहली नजर में अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन इनके केंद्र में भारतीय लोकतंत्र की एक समान चुनौती मौजूद है: राष्ट्रीय एकता और विविधता के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए।
‘वंदे मातरम’ को लेकर 1937 का निर्णय उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों में विभिन्न समुदायों को साथ लेकर चलने का प्रयास था। आज उसी ऐतिहासिक फैसले की व्याख्या अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोणों से की जा रही है। एक पक्ष इसे राष्ट्रीय भावना और राष्ट्रगीत के सम्मान से जोड़ता है, जबकि दूसरा इसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्थापित समावेशी परंपरा के रूप में देखता है। इसी तरह 15 अगस्त की घटना में भी आरोप और स्पष्टीकरण के बीच तथ्यात्मक स्थिति को राजनीतिक आरोपों से अलग रखना आवश्यक है।
दूसरी ओर, परिसीमन भारतीय लोकतंत्र के सामने प्रतिनिधित्व की बदलती वास्तविकताओं का प्रश्न रखता है। बढ़ती जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व बढ़ाना लोकतांत्रिक दृष्टि से तर्कसंगत प्रतीत हो सकता है, लेकिन ऐसा करते समय उन राज्यों के हितों की रक्षा करना भी जरूरी है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। सरकार द्वारा 50 प्रतिशत वृद्धि के मॉडल में दक्षिणी राज्यों की सीटें बढ़ने का तर्क दिया गया है, जबकि विपक्ष क्षेत्रीय हिस्सेदारी और संघीय संतुलन को लेकर आशंकित है।
अंततः दोनों विवाद यह संकेत देते हैं कि भारत जैसे बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुक्षेत्रीय लोकतंत्र में राष्ट्रीय प्रतीकों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़े फैसले केवल बहुमत के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भ, संवैधानिक मर्यादा, क्षेत्रीय संतुलन और सामाजिक समावेशन को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए। ‘वंदे मातरम’ की ऐतिहासिक यात्रा हो या लोकसभा के भविष्य के स्वरूप का प्रश्न—दोनों ही मामलों में संवाद और सहमति की प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत साबित हो सकती है।
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