सवालों के कटघरे में फिर कांग्रेस, ‘वंदे मातरम्’ पर गरमाई सियासत
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर एक बार फिर राजनीतिक विवाद सामने आया। लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘वंदे मातरम्’ के गायन के बीच कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित कार्यक्रम का एक वीडियो चर्चा का विषय बन गया। बीजेपी ने आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर इशारा कर राष्ट्रगीत को बीच में रोकने को कहा, जबकि कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि उनका इशारा खड़गे के बैठने की व्यवस्था को लेकर था। इस विवाद ने ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक महत्व, स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका और इसे लेकर कांग्रेस तथा बीजेपी के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक मतभेदों को फिर चर्चा में ला दिया है।
नई दिल्ली: देश जब 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आजादी के जश्न में डूबा था, उसी दौरान राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। राजधानी दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान ‘वंदे मातरम्’ के गायन को लेकर सामने आए एक वीडियो ने भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच एक बार फिर राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय प्रतीकों और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को लेकर बहस तेज कर दी है।
विवाद का केंद्र कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह का वह दृश्य है, जिसमें कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे नजर आ रहे हैं। वायरल वीडियो को लेकर बीजेपी नेताओं ने आरोप लगाया कि ‘वंदे मातरम्’ के पूर्ण गायन के दौरान सोनिया गांधी ने खड़गे की ओर इशारा करते हुए इसे रोकने के लिए कहा। हालांकि, कांग्रेस ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि सोनिया गांधी का इशारा राष्ट्रगीत रोकने के लिए नहीं, बल्कि वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए बैठने की व्यवस्था करने से संबंधित था।
लाल किले से ‘वंदे मातरम्’ और कांग्रेस मुख्यालय का विवाद
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से ‘वंदे मातरम्’ का गायन किया। इस मौके को राष्ट्रीय गीत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमिका से जोड़कर देखा गया। वहीं, कांग्रेस मुख्यालय में इसी गीत के गायन के दौरान सामने आए घटनाक्रम ने राजनीतिक बहस को नया मुद्दा दे दिया।
बीजेपी ने इस वीडियो को आधार बनाकर कांग्रेस पर ‘वंदे मातरम्’ के प्रति असम्मान का आरोप लगाया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस और सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए सार्वजनिक माफी की मांग की। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्व ने राष्ट्रगीत के गायन को बीच में रोकने की कोशिश की।
हालांकि, कांग्रेस की ओर से इस आरोप का खंडन किया गया है। पार्टी का कहना है कि वीडियो में दिखाई देने वाले इशारे को गलत संदर्भ में पेश किया जा रहा है और सोनिया गांधी का उद्देश्य राष्ट्रगीत का अपमान या उसे रोकना नहीं था। कांग्रेस के मुताबिक, खड़गे लंबे समय से खड़े थे और सोनिया गांधी उनके लिए कुर्सी की व्यवस्था करने की बात कर रही थीं।
‘वंदे मातरम्’ आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
‘वंदे मातरम्’ की कहानी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ी हुई है। इसकी रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। गीत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह एक प्रभावशाली राष्ट्रवादी उद्घोष बन गया।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘वंदे मातरम्’ का सार्वजनिक गायन किया था। कांग्रेस के अपने आधिकारिक दस्तावेजों में भी इस ऐतिहासिक भूमिका को स्वीकार किया गया है और पार्टी ने कहा है कि यह गीत स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान लोगों को एकजुट करने वाली आवाज बना।
समय के साथ ‘वंदे मातरम्’ भारतीय राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। हालांकि, इसके कुछ हिस्सों और धार्मिक संदर्भों को लेकर ऐतिहासिक रूप से बहस भी होती रही है। यही वजह है कि आज भी इसके पूर्ण संस्करण और सार्वजनिक आयोजनों में इसके गायन को लेकर राजनीतिक और वैचारिक चर्चा सामने आती रहती है।
1937 का फैसला और ‘वंदे मातरम्’ के पहले दो अंतरे
‘वंदे मातरम्’ को लेकर मौजूदा राजनीतिक बहस को समझने के लिए 1937 का संदर्भ महत्वपूर्ण है।
कांग्रेस के अनुसार, 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने निर्णय लिया था कि राष्ट्रीय आयोजनों में ‘वंदे मातरम्’ के शुरुआती दो अंतरों का उपयोग किया जाए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने 2025 में संसद में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर हुई चर्चा के दौरान इसी ऐतिहासिक फैसले का उल्लेख किया था।
खड़गे ने कहा था कि यह फैसला केवल जवाहरलाल नेहरू का व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि उस समय के कई प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं की सामूहिक सहमति से लिया गया था। कांग्रेस के आधिकारिक दस्तावेज में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, रवींद्रनाथ टैगोर, मौलाना अबुल कलाम आजाद, मदन मोहन मालवीय और अन्य नेताओं के संदर्भ में इस फैसले को समझाया गया है।
यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आज की राजनीतिक बहस में भी बार-बार सामने आती है। बीजेपी जहां कांग्रेस पर ‘वंदे मातरम्’ को लेकर कथित तौर पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि 1937 के फैसले को आज की राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से गलत तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है।
कांग्रेस पर आरोप पहली बार नहीं
‘वंदे मातरम्’ को लेकर कांग्रेस पर सवाल उठने की यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच इस गीत को लेकर राजनीतिक बयानबाजी होती रही है।
दिसंबर 2025 में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ को लेकर संसद में हुई चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस तथा जवाहरलाल नेहरू की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए थे। बीजेपी की ओर से आरोप लगाया गया कि कांग्रेस ने ‘वंदे मातरम्’ के मूल स्वरूप को सीमित किया।
इसके जवाब में मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस के स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान और ‘वंदे मातरम्’ के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के कार्यकर्ता स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष करते हुए जेल गए थे।
कांग्रेस ने 2025 में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर अपने आधिकारिक संदेश में भी कहा था कि पार्टी का इस राष्ट्रीय गीत के प्रति गहरा सम्मान है और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसे व्यापक रूप से अपनाया गया था।
बीजेपी का हमला और राजनीतिक संदेश
मौजूदा विवाद में बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया है। बीजेपी नेताओं का कहना है कि राष्ट्रीय गीत के गायन के दौरान किसी भी प्रकार का व्यवधान या उसे रोकने का प्रयास देश के राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति असम्मान माना जाना चाहिए।
अमित शाह ने इस मामले को कांग्रेस की राष्ट्रवादी राजनीति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया और सोनिया गांधी तथा कांग्रेस से सार्वजनिक माफी की मांग की। वहीं, बीजेपी के अन्य नेताओं ने भी वीडियो को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए कांग्रेस नेतृत्व पर निशाना साधा।
मामला इतना बढ़ गया कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे के खिलाफ ‘वंदे मातरम्’ के कथित अपमान को लेकर शिकायतें भी सामने आईं। दिल्ली पुलिस ने एक शिकायत के संबंध में जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है।
हालांकि, किसी राजनीतिक आरोप को अंतिम निष्कर्ष मानना उचित नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, विवाद का एक बड़ा हिस्सा वीडियो में दिखाई देने वाले इशारों की अलग-अलग व्याख्याओं पर आधारित है और कांग्रेस ने बीजेपी के आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज किया है।
कांग्रेस का पक्ष भी समझना जरूरी
कांग्रेस का तर्क है कि पार्टी को ‘वंदे मातरम्’ का विरोधी बताना ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है। पार्टी बार-बार यह याद दिलाती रही है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस गीत का इस्तेमाल ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनजागरण के लिए किया था।
2025 में ‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ पर मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी कहा था कि कांग्रेस ने इस गीत को स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांग्रेस ने यह भी तर्क दिया कि आज बीजेपी जिस मुद्दे को राजनीतिक विवाद का रूप दे रही है, उसके पीछे एक लंबा ऐतिहासिक संदर्भ मौजूद है।
इसलिए मौजूदा विवाद को केवल एक वीडियो क्लिप के आधार पर देखने के बजाय इसके ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ को समझना भी जरूरी है।
राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान में अंतर
‘वंदे मातरम्’ को लेकर बहस के बीच एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा प्राप्त है।
दोनों का अपना अलग ऐतिहासिक महत्व है। ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन की राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति से जुड़ा राष्ट्रीय गीत है।
इसी कारण ‘वंदे मातरम्’ के प्रति सम्मान का मुद्दा केवल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा विषय नहीं है। यह भारत के स्वतंत्रता संघर्ष, सांस्कृतिक स्मृति और राष्ट्रीय भावना से जुड़ा विषय है।
असली सवाल: राष्ट्रगीत पर राजनीति क्यों?
मौजूदा विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राष्ट्रीय प्रतीकों को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बनाया जाना चाहिए?
एक पक्ष का कहना है कि राष्ट्रीय गीत के प्रति सम्मान किसी भी राजनीतिक विचारधारा से ऊपर होना चाहिए। दूसरे पक्ष का तर्क है कि ऐतिहासिक घटनाओं और प्रतीकों को राजनीतिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
भारत जैसे लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच विचारों का टकराव स्वाभाविक है। लेकिन राष्ट्रीय प्रतीकों से जुड़े मुद्दों पर बहस करते समय तथ्य, इतिहास और संदर्भ को प्राथमिकता देना जरूरी है।
कांग्रेस मुख्यालय की घटना को लेकर अभी भी दो अलग-अलग दावे सामने हैं। बीजेपी इसे ‘वंदे मातरम्’ को रोकने की कोशिश के तौर पर देख रही है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि सोनिया गांधी का इशारा खड़गे के लिए बैठने की व्यवस्था करने से संबंधित था।
निष्कर्ष
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं है। यह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का हिस्सा है और लाखों भारतीयों की राष्ट्रीय भावना से जुड़ा हुआ है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की रचना से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन में इसके इस्तेमाल और आज की राजनीतिक बहस तक, इस गीत की यात्रा भारतीय इतिहास के कई महत्वपूर्ण अध्यायों को अपने भीतर समेटे हुए है।
15 अगस्त 2026 को कांग्रेस मुख्यालय में सामने आई घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए। विवाद के केंद्र में मौजूद वीडियो की अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही हैं और दोनों प्रमुख राजनीतिक पक्ष अपने-अपने तर्क दे रहे हैं।
ऐसे में जरूरी है कि ‘वंदे मातरम्’ जैसे ऐतिहासिक राष्ट्रीय प्रतीक को राजनीतिक विवाद से आगे जाकर उसके वास्तविक ऐतिहासिक महत्व के साथ देखा जाए। स्वतंत्रता दिवस का मूल संदेश भी यही है कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र और उसके स्वतंत्रता संघर्ष की विरासत सभी भारतीयों की साझा धरोहर है।
आपकी क्या प्रतिक्रिया है?